कू-कू करैत कोयली, मन्द मन्द बहैत बसात, चारू तरफ फैलल आमक सुगंध....एहि प्रौढ़ बसंतक मौसम में गाछी के बीचोबीच खोपड़ी में राखल खाट पर चित्त पड़ल टुनटुनमा सोंचि रहल छल जे कतेक दिन भऽ गेल देह के खुलल बसात लगौला....मतलब सदिखन बौआयत रहनिहार टुनटुनमा आम खा कऽ सुस्त भऽ गेल अछि जे टुनटुनमाक स्वभाव सँ बिल्कुल उल्टा अछि। अपने मे मस्त रहनिहार.... गाम घरक खबरची.... जेकर पैठ नेना भुटका सँ लऽ कऽ प्रौढ़-वृद्ध तक अछि। सभ जातिक संग ऊठ-बैठ, सभक कर-कुटमैता घूमय में माहिर के मन में फेरो आबि रहल छै जे बैसल-बैसल देह जाम भऽ गेल....कतऽ घूमल जाय... एकाएक फुरफुराकऽ उठल खाट प सँ आओर विदा भऽ गेल मुदा कतऽ से ओकरो पता नहि....